तीसरा प्रिंट संस्करण केवल 4 महीनों में
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जनसभा (jansabha.org) एक नई सोच है। हिन्दी विश्व की तीन सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक फिर भी पुस्तक प्रकाशन में पीछे। यह व्यवस्था का विकार है या पाठक की उदासीनता? नवीन विचारों की कमी है या समकालीन उपभोक्ता की अपेक्षा से कम एक उत्पाद? संभवतः सारे कारण हैं। जनसभा एक प्रयास है, एक साधना है इस दिशा में।
जनसभा के तीन स्तंभ हैं – भूमि, भाषा एवं भाव। भारत भूमि, भारतीय भाषाएं एवं भाव पारदर्शिता का। हिन्दी अगर हमारी मातृ भाषा है तो सारी मूलतः भारतीय भाषाएं हमारी मा-सी (मौसी)| जनसभा में हमारा प्रयास है प्रकाशक-लेखक के बीच एक नई पारदर्शिता लाने का। हमारी महत्वाकांक्षा है हिन्दी के लेखकों को लेखनी से ही पूरी आजीविका यापन हो, भाषा की सेवा में आर्थिक संघर्ष कम से कम हो।
जनसभा के सारे प्रकाशन भारत हित एवं भारतीयता के अध्ययन-प्रचार को समर्पित हैं।
मुंबई की आपाधापी और कार्यस्थल की अदृश्य चुनौतियों से रूठी मुक्ता नौकरी को अलविदा कहना चाहती है; अपने साथी को नहीं।
मुक्ता के जीवन में रोमांच और अतिरेक का बुलबुला फूट चुका है पर उसके और विराग के बीच पल्लवित होती प्रेम की बेल हरी है ये जानते हुए भी लौट आती है अपने घर।
“आखिर क्यों भाग रही है वो एक शहर से? ये महानगर भी तो उसी ने चुना था।”
“क्या विराग महानगरीय ज़िंदगी का अकेलापन झेल सकेगा?”
“क्या संवाद के माध्यम दूरियों का भूगोल मिटा सकेंगे?”
गांधी हत्याकांड का सच सिर्फ इतना भर नहीं है कि 30 जनवरी 1948 की एक शाम गोडसे बिड़ला भवन आया और उसने गांधी को तीन गोली मार दीं। दरअसल, गांधी हत्याकांड को संपूर्ण रुप से समझने के लिये इसकी पृष्ठभूमि का तथ्यात्मक अध्ययन अति आवश्यक है। इस पुस्तक में गांधी की हत्या से जुड़े एक पूरे काल खंड का बारीकी से अध्ययन किया गया है।
आज़ादी के आंदोलन का अंतिम दौर, मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग, सांप्रदायिक दंगे, देश का विनाशकारी विभाजन, लुटे-पिटे शरणार्थियों की समस्या, मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा, पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिये गांधी का हठ, हिंदुओं के मन में पैदा हुआ उपेक्षा और क्षोभ का भाव, सत्ता और शक्ति के लिए कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व में पड़ी फूट जैसी कई वजहों से गांधी हत्याकांड की पृष्ठभूमि तैयार होती है। गोडसे की चलाई तीन गोलियों की तरह ये सब मुद्दे भी गांधी की हत्या के लिये बराबरी से जिम्मेदार हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि जब-जब गांधी की हत्या की बात होती हैं तो इन मुद्दों पर चुप्पी साध ली जाती है।
“इस उपन्यास को न केवल पढ़ा जाना चाहिए बल्कि इस पर जगह-जगह चर्चा होनी चाहिए।”
मनीषा कुलश्रेष्ठ
वरिष्ठ साहित्यकार एवं कथाकार
“यह उपन्यास स्थानीय परिवेश, स्थानीय चीजों, हस्तशिल्प, अनाजों, वनस्पतियों के साथ-साथ उस जीवन शैली के विविध रूपों को भी अभिव्यक्त करता है जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं या विस्मृत कर चुके हैं।”
उर्मिला शिरीष
वरिष्ठ साहित्यकार एवं कथाकार
“श्वेता उपाध्याय ने साहित्य और विज्ञान के अद्भुत संगम के माध्यम से एक ऐसी कृति प्रस्तुत की है, जो पर्यावरणीय चेतना को एक नए स्तर पर स्थापित करती है।”
प्रोफेसर डॉ. देवेंद्र मोहन कुमावत
वरिष्ठ शिक्षाविद
“केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि साहित्य के माध्यम से पर्यावरणीय न्याय की सशक्त और ज़रूरी आवाज़ है - और आज के समय में ऐसी आवाज़ की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।"
डॉ. मनोज कुमार मणि चतुर्वेदी
वरिष्ठ पर्यावरणविद्
प्रखर श्रीवास्तव ने आधुनिक भारतीय इतिहास के विवादित विषयों पर निर्भीक विचारक एवं टिप्पणीकार के रूप
में ख्याति अर्जित की है। उनके संभाषणों ने भारतीयों की एक पूरी पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के कठिन एवं
कष्टदायी आयामों और इस संघर्ष की विभिन्न विभूतियों के स्याह पहलुओं से अवगत कराया है। गहन शोध पर
आधारित, तार्किक और भाव रहित शैली में प्रखर ने स्वतंत्रता इतिहास के उन आयामों पर प्रकाश डाला है जो
आज तक हमारे समाज एवं राज व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। इनमें से बहुत सारे विषय हमारे
इतिहासकारों और साहित्यकारों के एक वर्ग के द्वारा दबा दिए गए, इसलिए प्रखर के कार्यों का योगदान अधिक
मूल्यवान है।
प्रखर श्रीवास्तव ने भारत के औपनिवेशक शासकों के विरुद्ध युद्ध के ढेरों अछूते विषयों के बारे में जनसामान्य
को एक वृहद् ज्ञान कोष उपलब्ध कराया है। उनकी पुस्तक ‘हे राम: गांधी हत्याकांड की प्रामाणिक पड़ताल’ इन
विषयों पर होने वाली सार्वजनिक चर्चाओं के बीच एक सशक्त दखल है। यह पुस्तक 1946 में कांग्रेस पार्टी के
अध्यक्ष के नामांकन से आरंभ होती है। यह वो समय था जब कांग्रेस अध्यक्ष का पद अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया
था। यह तय था जो अध्यक्ष होगा वही स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री बनेगा। यह सर्वविदित था कि महात्मा गांधी
की पसंद जवाहरलाल नेहरू थे। लेकिन एक भी प्रदेश कांग्रेस समिति ने नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया
था। 15 राज्य कांग्रेस समितियों में से 12 ने सरदार पटेल के लिए समर्थन व्यक्त किया, जबकि 3 ने किसी को
नामित नहीं किया।
प्रखर श्रीवास्तव ने उस समय की घटनाओं का विस्तृत ब्यौरा दिया है। इनमें कैबिनेट मिशन, डायरेक्ट एक्शन
डे, नोआखली में हिंदूओं का नरसंहार और गांधी की घोषणा कि विभाजन उनके शव पर होगा इत्यादि हैं।
लेखक ने विभाजन के उपरांत दिल्ली और बंगाल समेत देश के विभिन्न भागों में हुए दंगों, मुस्लिम तुष्टिकरण
और नेहरू-पटेल के बीच मतभेद को भी बहुत सूक्ष्मता से लिपिबद्ध किया है। पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये
देने की महात्मा गांधी की हठ विवाद का एक मुख्य कारण थी। पाकिस्तान से आए हिंदू-सिख शरणार्थियों के
पुनर्वास और भारत में रह गए मुसलमानों के तुष्टीकरण के विषयों को पूरी स्पष्टता के साथ लिखा है।
पुस्तक का दूसरा खंड नाथूराम गोडसे और गांधी की हत्या के कारकों पर केंद्रित है। प्रखर श्रीवास्तव ने साक्ष्य
उपलब्ध कराए हैं कि पुलिस के पास गांधी पर संभावित हमले की पर्याप्त सूचना थी, फिर भी पुलिस उनकी
सुरक्षा में विफल रही। लेखक ने गोडसे के विषय में बदलते जनमानस को भी दर्ज किया है।
प्रखर श्रीवास्तव ने इन घटनाओं के 200 से अधिक प्रत्यक्षदर्शियों और भागीदारों के विवरण के आधार पर यह
पुस्तक लिखी है। उन्होंने असहज करने वाले अकाट्य तथ्य प्रस्तुत किए हैं। साथ ही अपने निजी विचार और
साक्ष्यों की मर्यादा को भी बनाए रखा है। यह पुस्तक उस कालखंड के बारे में जानने के लिए लोगों में बढ़ती
रुचि को बिना किसी वैचारिक झुकाव के पूरा करती है।
डॉ. मीनाक्षी जैन
पद्मश्री सम्मानित इतिहासकार एवं सीनियर फे लो, नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय, नई दिल्ली
गांधी पर अब तक जितना भी लिखा गया एक तरफा ही लिखा और सुनाया गया। गांधी राम और सीता से भी
बढकर है, सीता जी के चरित्र पर सवाल कर सकने की आज़ादी हैं, राम पर सकते है लेकिन गांधी पर किसी
तरह का सवाल उठाना तो दूर सोचने तक इजाजत नहीं है। गांधी पर वही चर्चा हो, जिसकी सीमाएँ लम्बे समय
से तय हो चुकी है…. अगर गांधी को तय सीमाओं से बाहर ले जाने की जिसने भी कोशिश की तो फिर उसका
सामूहिक बौद्धिक बहिष्कार कर अलग थलक करने की चौतरफ़ा कोशिश की जाती रही है, क्योंकि इस ब्रिगेड के
लिए गांधी एक ब्रांड हैं और इस ब्रांड में सिर्फ मुनाफ़ा ही मुनाफ़ा है जो भी इस पर सवाल उठाने की
कोशिश करेगा उस पर अहिंसा के पुजारी हिंसक हो जाते है पहला हमला ये गोडसे समर्थक है, ये संघी हैं अनेकों
अमर्यादित भाषाई हमले होना शुरू हो जाते है, लेकिन संचार क्रांति के इस दौर में वे तय सीमाएँ टूट रहीं है।
गांधी के बारे में बने हुए मानक ढह रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ इस क्रांति से नए मानकों का निर्माण भी हो रहा
है। इस क्रम में मेरे दोस्त प्रखर श्रीवास्तव ने एक तथ्यात्मक, शोध आधारित, इतिहास में दर्ज उन पन्नों से धूल
हटाई है जो गांधी के राजनीतिक, सामाजिक और सार्वजनिक निजी जीवन अनेकों घटनाओं जैसे मुस्लिम लीग
की भूमिका, नेहरू को अध्यक्ष बनाने का सच, नवाखली और मोपला में हिन्दुओं के नरसंहार पर उनकी चुप्पी
ऐसे अनेक तथ्यों को एक पुस्तक के रूप में रखा है। प्रखर की प्रखर वाणी तो आपने सोशल मीडिया और
टेलीविजन पर तो ज़रूर सुनी होगी लेकिन अब उन्होंने अपनी वाणी को लेखनी में तब्दील किया है। मुझे पूरी
उम्मीद है और मेरी शुभकामनाएँ है की उनकी ये कोशिश आज के युवाओं को गांधी के सिलसिले में एक नया
पर्सपेक्टिव देंगी।
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
गांधी की हत्या इतिहास की एक बड़ी घटना जरूर थी लेकिन ये नियति थी। क्योंकि तब तक गांधी ने अपना
कद इतना गिरा लिया था कि उन्हें केवल हर बात पर बेवजह टांग अड़ाने वाले की तरह देखा जाने लगा था।
उनका व्यवहार भारत की नई सरकार के लिए उलझने खड़ी कर रहा था। मुसलमान गांधी को अपने फायदे के
लिए इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि गांधी की यहीं बातें हिन्दुओं के लिए जहर के प्याले के समान थीं। प्रखर
श्रीवास्तव की यह पुस्तकें बिना किसी लागलपेट के विभाजन के दौर में गांधी की नीतियों का लेखा-जोखा
प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने एक-एक घटना की दस्तावेजों की मदद से सटीक व्याख्या की है। प्रखर का यह प्रयास
न केवल कई मिथकों को तोड़ता है बल्कि इतिहास के वर्णन को भी नए सिरे से स्थापित करता है। यह पुस्तक
इतिहास के उन पाठकों के लिए है जो इसे नई नजर से पढ़ना और समझना चाहते हैं।
संजय दीक्षित (रिटा. आइएएस)
पूर्व अपर मुख्य सचिव राजस्थान सरकार एवं चेयरमैन, जयपुर डायलॉग्
वर्तमान समय में इस पुस्तक की बहुत आवश्यकता थी। देश की आजादी का आंदोलन, विभाजन की त्रासदी,
मुस्लिम तुष्टिकरण, गांधी की हत्या का जिम्मेदार कौन? जैसे मुद्दों पर आये दिन राजनैतिक बहस होती है। इन
सभी संदर्भ में प्रखर श्रीवास्तव की ये पुस्तक नये आयाम पेश करती है। ये पुस्तक गांधी हत्याकांड और गोडसे से
जड़ेु कई बड़े खुलासे तो करती ही है, साथ ही ये 1946 से लेकर 1948 तक के उस काल का पूरा लेखा-जोखा
प्रस्तुत करती है, जिसने भारत के भविष्य को प्रभावित किया है। प्रखर ने इस पुस्तक को लिखने के लिये गहन
रिसर्च किया है। इस रिसर्च की सबसे खास बात है कि उन्होंने उस दौर के दस्तावेज़ों के साथ साथ उन हस्तियों
के संस्मरणों को एक सूत्र में पिरोया है जो उस दौर में भारतीय उपमहाद्वीप के मच पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा
रहे थे। निश्चित तौर पर ये पुस्तक वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को देश की आजादी और विभाजन जैसे
मुद्दों पर एक अलग नजरिये से सोचने की बौद्धिक खुराक देगी।
अनुज धर
प्रसिद्ध लेखक
विश्व के इतिहास में शायद एक भी ऐसा देश नहीं मिलेगा जहां के नेताओं ने अपने ही समाज के लोगों को, अपने
ही अनुयायियों को बेरहमी से ठगा और छला हो, अपने ही सहधर्मियों को भेड़ियों के हवाले कर दिया हो, जैसा
भारत में हुआ है। आज यह जानना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि हिन्दु समाज में ऐसी क्या कमजोरी है कि
वह बार-बार ठगा जाने के बावजूद, उन्हीं नेताओं को अपना रहनुमा मान लेता हैं जिन्होंने उसे मौत के मुंह में
धकेला और धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा पहन कर हिन्दुओं को बर्बर आक्रांताओं की गुलामी स्वीकारने को मजबूर
किया। प्रखर श्रीवास्तव की यह पुस्तक पूरे हिन्दु समाज को झकझोर देने की क्षमता रखती है। गांधी और नेहरु
के मंदबुद्धि भक्तों के अलावा, कोई विरला ही पाठक होगा जिसका इस पुस्तक के हर पन्ने को पढ़ते हुए खून ना
खौले और जिसका हृदय उस दौर के कुछ नेताओं के प्रति आक्रोश से ना भर जाए। यह पुस्तक कोई राजनैतिक
प्रोपेगैंडा नहीं है और ना ही प्रखर ने इस पर अपने स्वयं के विचार का बोझ थोपा है। इस पुस्तक का हर
अध्याय तथ्यों से लैस है, वो तथ्य जो गांधी नेहरु के विरोधियों ने नहीं लिखे हैं, बल्कि उन्हीं के करीबी साथियों
और अनुयायियों ने अपनी पुस्तकों में संजोए हैं। ये सारे तथ्य अं ग्रेज़ी में लिखी अनेक पुस्तकों में बिखरे पड़े थे।
परंतु इन सब पुस्तकों में पेश की गई अमूल्य जानकारी को कांग्रेस पार्टी के सहयोगी वामपंथी और मुस्लिम
परस्त इतिहासकारों ने अधिकारिक इतिहास में जानबू झकर छुपा कर रखा। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता
ये है कि पाठकों को किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचाने के लिये प्रखर श्रीवास्तव उकसाते नहीं हैं। मैं प्रखर श्रीवास्तव
की आभारी हूं कि उन्होंने गां धी-नेहरू, विभाजन, शरणार्थी और मुस्लिम तुष्टिकरण से जुड़े कड़वे इतिहास
का पर्दाफाश किया। आशा करती हूं कि यह पुस्तक घर-घर पहुंचेगी और आज की युवा पीढ़ी को निडरता और
निष्पक्षता से इतिहास लिखने और पढ़ने के सीख देगी।
मधु पूर्णिमा किश्वर
सीनियर फेलो, नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय, संस्थापक मानषी एव नेशनल प्रोफेसर, इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइसं रिसर्च
यह एक अद्भुत शोधपरक पुस्तक है। इस पुस्तक की जो बात इसे अलग बनाती है वह यह है कि लेखक ने
बिना किसी पक्षपात या पूर्वाग्रह के समकालीन दस्तावेजों के माध्यम से उस दौर के इतिहास को प्रस्तुत करने का
सचेत प्रयास किया है। गांधी हत्याकांड से जुड़ी देश, काल, स्थिति-परिस्थिति बेहद रोमांचक अंदाज में इस पुस्तक
में प्रकट होती है। प्रखर श्रीवास्तव की इस पुस्तक के लिये यही कहा जा सकता है कि ये एक अवश्य पढ़ी जाने
वाली पुस्तक है।
नीरज अत्री
प्रसिद्ध लेखक, शिक्षाविद एवं राष्ट्रवादी विचारक
प्रखर श्रीवास्तव एक नायब पत्रकार हैं, जो हमेशा संदर्भ और सबूतों के साथ अपनी बात कहते हैं। गहन शोध के
साथ लिखी गई उन की ये किताब हिंदुस्तान ही नहीं पाकिस्तान के इतिहास के नजरिए से भी बहुत खास है।
क्या किताब को पढ़ कर ये पता चलता है की मिस्टर जिन्ना, मुस्लिम लीग, पाकिस्तान आंदोलन और भारतीय
उपमहाद्वीप के मुसलमानों को लेकर गांधी जी की क्या सोच थी। खासकर पाकिस्तान के आवाम को ये पता
होना चाहिए की पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलाने के लिए गांधी जी ने किस तरह से अपनी जान की
बाजी लगी थी। गांधी जी के यही विचार आगे जाकर उनकी हत्या की वजह बने। गांधी जी सही मायने में
पाकिस्तान और मुसलमानों के सच्चे दोस्त थे। लेकिन ये बदकिस्मती है कि पाकिस्तान की इतिहास की किताब
में उन्हें 'खलनायक' बनाकर पेश किया जाता है। इस किताब का उर्दू अनुवाद जरूर होना चाहिए।
शकील चौधरी
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार एवं स्कॉलर
प्रखर श्रीवास्तव से मेरा परिचय एक दर्शक और प्रस्तुतकर्ता का रहा है, पहले पत्रकार के रूप में और अब
विश्लेषक के रूप में। उनकी निष्पक्ष और धारदार सोच से मैं आरम्भ से ही प्रभावित रहा हू और उसका कारण
यह भी है कि उनकी समीक्षाओं में गहन अध्ययन का आधार होता है। पिछले कुछ समय से मैं उनकी
अनुसन्धान युक्त क्रमिक मालिका ‘खरी बात प्रखर के साथ’ नियमित रूप से देख रहा हूँ। किसी एक विषय पर
नखशिख शोध करने के बाद, तथ्यों की पूरी जाँच पड़ताल करके जिस तरह की प्रस्तुति वे करते हैं, सचमुच वो
प्रशंसनीय है। वर्तमान कालखंड में बहुत सारी मिथ्या धारणाएं हम पर थोपी गई हैं, ऐसे संक्रमण काल में प्रखर जी
जैसे ‘प्रखर’ व्यक्तित्व को अपने बीच पाना सौभाग्य ही है।
शेखर सेन
पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध रंगकर्मी एवं पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय संगीत नाट्य अकादमी
हर सच्चे भारतीय की तरह बापू मेरे हृदय के भी बेहद करीब हैं। बापू की हत्या के इतने सालों बाद भी, उन पर
लगातार लिखा जाना और उनका भारतीय राजनीति के केंद्र में बना रहना यह बताता है कि वे मनुष्य जाति के
इतिहास में लगातार प्रासंगिक बने रहेंगे। प्रखर श्रीवास्तव की बापू पर लिखी यह किताब, किसी इतिहासकार की
लिखी अकादमिक किस्म की रचना नहीं है बल्कि यह एक पत्रकार की ऐसी रचना है, जिसे पढ़ते हुए आप अनेक
रोमांचक, हैरतअंगेज और दिलचस्प विवरणों से गुजरते हैं।
आलोक श्रीवास्तव
प्रसिद्ध कवि और पत्रकार