ॐ श्री गुरूभ्यो नमः

जनसभा

जनसभा (jansabha.org) एक नई सोच है। हिन्दी विश्व की तीन सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक फिर भी पुस्तक प्रकाशन में पीछे। यह व्यवस्था का विकार है या पाठक की उदासीनता? नवीन विचारों की कमी है या समकालीन उपभोक्ता की अपेक्षा से कम एक उत्पाद? संभवतः सारे कारण हैं। जनसभा एक प्रयास है, एक साधना है इस दिशा में।
जनसभा के तीन स्तंभ हैं – भूमि, भाषा एवं भाव। भारत भूमि, भारतीय भाषाएं एवं भाव पारदर्शिता का। हिन्दी अगर हमारी मातृ भाषा है तो सारी मूलतः भारतीय भाषाएं हमारी मा-सी (मौसी)| जनसभा में हमारा प्रयास है प्रकाशक-लेखक के बीच एक नई पारदर्शिता लाने का। हमारी महत्वाकांक्षा है हिन्दी के लेखकों को लेखनी से ही पूरी आजीविका यापन हो, भाषा की सेवा में आर्थिक संघर्ष कम से कम हो।
जनसभा के सारे प्रकाशन भारत हित एवं भारतीयता के अध्ययन-प्रचार को समर्पित हैं।

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