मुंबई शहर में विराग के साथ रहती मुक्ता जब थोड़ी आशंका, अनुराग और आश्वस्ति समेटे अपने घर मंडला लौटती है तो यहाँ उसे मिलती है कुछ निर्मूल आशंकायें। संवाद के माध्यम सेतु तो हैं पर क्या ये पर्याप्त हैं?
प्रकृति, नदी, पेड़, परिवार और अपने अंतर्मन से निरंतर संवाद करती मुक्ता एक पर्यावरणविद् होकर क्या अपने यथार्थ से मुक्त होना चाहती हैं?
क्या महानगर की अतिवादी बयार में विराग का प्रेम तटस्थ रह सकता है? क्या विराग स्पर्श की अनुपस्थिति में एक नया साथ चुनने को स्वतंत्र है?
उन्मुक्त मुक्ता और बंधन में आस्था रखता विराग आखिर सहमति- असहमति के किस सेतु से गुज़रेंगे?
“धरा होम स्टे” में एक बैगा परिवार का आतिथ्य स्वीकार मुक्ता जीवन, जीवटता और जंगल के जीवन-तंत्र को आत्मसात कर रूपांतरण की सजीव प्रक्रिया से रूबरू होती हैं पर वनवासी समुदाय के प्रति मुक़्ता का प्रेम स्वान्तः सुखाय का भाव हैं या हरित -व्यापार करने की कोई नयी योजना?
उपन्यास कथानकों की बतकही से उनकी मंशा टटोलता उनके दिल की हर गिरह को खोल बेझिझक वो प्रश्न करता हैं जो प्रज्ञा से उपजते है और समानुभूति की भाषा बोलते हैं। अंतर्द्वंदों से जूझते मुक्ता और विराग नदी, पर्वत, विडम्बनाओं, सामाजिक मर्यादा और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच क्या अपने प्रेम को चिर – यौवन दे सकेंगे या उनका प्रेम भी “स्वप्रेम“ की आहुति बन जाएगा?
आदिवासी समुदाय के प्रति कर्तव्यनिष्ठ हो चुकी मुक्ता स्वतंत्रता की कौन सी नयी और अनूठी भाषा सीखेगी?
धरा और स्व-सहायता केंद्र का संचालन करती महिलाओं के साथ मुक्ता सतत विकास का कौन सा उद्देश्य साधना चाहती है?
सतत विकास के मुख्य मार्ग पे निर्बाध बढ़ता उपन्यास क्या वनवासियों को विकास का नया प्रारूप देगा?
कथानकों की आपकही सुनने के लिए पढ़िए - धरा के अंक में
तीसरा प्रिंट संस्करण केवल 4 महीनों में
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जनसभा (jansabha.org) एक नई सोच है। हिन्दी विश्व की तीन सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक फिर भी पुस्तक प्रकाशन में पीछे। यह व्यवस्था का विकार है या पाठक की उदासीनता? नवीन विचारों की कमी है या समकालीन उपभोक्ता की अपेक्षा से कम एक उत्पाद? संभवतः सारे कारण हैं। जनसभा एक प्रयास है, एक साधना है इस दिशा में।
जनसभा के तीन स्तंभ हैं – भूमि, भाषा एवं भाव। भारत भूमि, भारतीय भाषाएं एवं भाव पारदर्शिता का। हिन्दी अगर हमारी मातृ भाषा है तो सारी मूलतः भारतीय भाषाएं हमारी मा-सी (मौसी)| जनसभा में हमारा प्रयास है प्रकाशक-लेखक के बीच एक नई पारदर्शिता लाने का। हमारी महत्वाकांक्षा है हिन्दी के लेखकों को लेखनी से ही पूरी आजीविका यापन हो, भाषा की सेवा में आर्थिक संघर्ष कम से कम हो।
जनसभा के सारे प्रकाशन भारत हित एवं भारतीयता के अध्ययन-प्रचार को समर्पित हैं।
मुंबई की आपाधापी और कार्यस्थल की अदृश्य चुनौतियों से रूठी मुक्ता नौकरी को अलविदा कहना चाहती है; अपने साथी को नहीं।
मुक्ता के जीवन में रोमांच और अतिरेक का बुलबुला फूट चुका है पर उसके और विराग के बीच पल्लवित होती प्रेम की बेल हरी है ये जानते हुए भी लौट आती है अपने घर।
“आखिर क्यों भाग रही है वो एक शहर से? ये महानगर भी तो उसी ने चुना था।”
“क्या विराग महानगरीय ज़िंदगी का अकेलापन झेल सकेगा?”
“क्या संवाद के माध्यम दूरियों का भूगोल मिटा सकेंगे?”
गांधी हत्याकांड का सच सिर्फ इतना भर नहीं है कि 30 जनवरी 1948 की एक शाम गोडसे बिड़ला भवन आया और उसने गांधी को तीन गोली मार दीं। दरअसल, गांधी हत्याकांड को संपूर्ण रुप से समझने के लिये इसकी पृष्ठभूमि का तथ्यात्मक अध्ययन अति आवश्यक है। इस पुस्तक में गांधी की हत्या से जुड़े एक पूरे काल खंड का बारीकी से अध्ययन किया गया है।
आज़ादी के आंदोलन का अंतिम दौर, मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग, सांप्रदायिक दंगे, देश का विनाशकारी विभाजन, लुटे-पिटे शरणार्थियों की समस्या, मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा, पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिये गांधी का हठ, हिंदुओं के मन में पैदा हुआ उपेक्षा और क्षोभ का भाव, सत्ता और शक्ति के लिए कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व में पड़ी फूट जैसी कई वजहों से गांधी हत्याकांड की पृष्ठभूमि तैयार होती है। गोडसे की चलाई तीन गोलियों की तरह ये सब मुद्दे भी गांधी की हत्या के लिये बराबरी से जिम्मेदार हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि जब-जब गांधी की हत्या की बात होती हैं तो इन मुद्दों पर चुप्पी साध ली जाती है।
कथा कहन कार्यशाला की गार्गी राइटर्स रेजीडेंसी से उपजी।
मुंबई की आपाधापी और कार्यस्थल की अदृश्य चुनौतियों से रूठी मुक्ता नौकरी को अलविदा कहना चाहती है; अपने साथी को नहीं।
मुक्ता के जीवन में रोमांच और अतिरेक का बुलबुला फूट चुका है पर उसके और विराग के बीच पल्लवित होती प्रेम की बेल हरी है ये जानते हुए भी लौट आती है अपने घर।
“आखिर क्यों भाग रही है वो एक शहर से? ये महानगर भी तो उसी ने चुना था।”
“क्या विराग महानगरीय ज़िंदगी का अकेलापन झेल सकेगा?”
“क्या संवाद के माध्यम दूरियों का भूगोल मिटा सकेंगे?”
“प्रेम और साथी की अनुपस्थिति में दोनों किसी नए आकर्षण में बंधेंगे या संवाद समाधान बनेगा?”
“जीवन स्पर्श की अनुभूतियों के बिन कैसा होगा?”
“कहीं विडम्बनाओं, सामाजिक मर्यादा और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच मुक्ता और विराग का प्रेम लाजवंती का वह पौधा तो नहीं बन गया जो सिर्फ़ एक स्पर्श से खिलता और बुझता है!”
अपनी बेचैनियों को सुकून देने कान्हा राष्ट्रीय उद्यान पहुँची मुक्ता बैगा परिवार के आतिथ्य, जंगल, नदी, लोक जीवन और धरा की मित्रता से क्या सीख लेगी?
वनवासी जीवन, धरा की मित्रता और एकांत मुक्ता को परिवर्तन की एक नवीन जीवन-धारा से कैसे जोड़ेंगे?
धरा का नेतृत्व स्वीकारती नायिकाएँ स्वयं के लिये आर्थिक स्वायत्तता चुनेंगी या परम्परागत जीवनशैली?
समाधान के मध्य फिर कुछ प्रश्न गूँजेंगे –
“क्या प्रेम और स्वतंत्रता साथ नहीं रह सकते?”
“क्या पलायन नयी जीवनशैली है?”
“क्या वनवासी -समाज परिवर्तन के लिए तैयार है?”
मुक्ता, धरा और विराग एक समूह के साथ आगे बढ़ते जीवन की नीम – अंधेरी पगडंडियों से निकल समाधान के मुख्य मार्ग तक कैसे पहुँचेंगे?
पारिजात के खिलने से लेकर अमलतास के फूलने तक किरदारों का सफ़र कैसा होगा, जानने के लिए पढ़े – “धरा के अंक में”।
श्वेता उपाध्याय छत्तीसगढ़ भिलाई में निवासरत एक पर्यावरण प्रबंधन विशेषज्ञ और सतत विकास की रणनीतिकार हैं जो पर्यावरणीय अनुपालन, कार्बन परियोजनाओं और प्रशिक्षण में उल्लेखनीय अनुभव रखती हैं। श्वेता वैज्ञानिक सोच और मानवीय संवेदनशीलता को साथ लेकर आगे बढ़ती एक विचारशील लेखिका भी हैं।
उन्होंने वर्ष 2000 में विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से पर्यावरण प्रबंधन में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। इसके पश्चात उन्होंने आजीविका के लिए आधुनिक पारितंत्रों की खोज शुरू की और कई वर्षों तक विभिन्न संगठनों के साथ कार्य किया। इस दौरान उन्होंने पर्यावरण प्रबंधन के साथ-साथ शैक्षिक संस्थानों में भी नेतृत्व भूमिका निभाई।
वर्तमान में वे Global Sustainability Solutions and Services QFZ LLC (दोहा, कतर) में वरिष्ठ सलाहकार (कार्बन परियोजनाएँ, प्रशिक्षण और सतत विकास) के पद पर कार्यरत हैं। इसके साथ ही, वे Resilient Sustainance Private Limited (भारत) में निदेशक की भूमिका भी निभा रही हैं। श्वेता, Institute of Sustainability and Environmental Professionals (ISEP), United Kingdom – formerly IEMA की प्रैक्टिशनर सदस्य हैं। यह सदस्यता उन्हें वैश्विक स्तर पर सतत विकास और पर्यावरणीय नेतृत्व में उत्कृष्ट योगदान के लिए मान्यता प्रदान करती है।
इन सभी पेशेवर भूमिकाओं के साथ-साथ, श्वेता कवि हृदय है। क़िस्से, कहानियाँ, कविताएँ और अब ये उपन्यास उनकी रचनात्मक ज़िंदगी का अभिन्न हिस्सा है। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई, सामाजिक यथार्थ और पर्यावरणीय चेतना का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है।
श्वेता उपाध्याय लेखन और पर्यावरणीय नेतृत्व, दोनों क्षेत्रों में एक प्रभावशाली आवाज बनकर उभर रही हैं। जनसभा प्रकाशन एवं उनके पाठकों को उनसे यह आशा है कि उनकी सृजनशीलता समाज को सदैव एक अनुपम कृति देगी।
“धरा के अंक में” श्वेता का प्रथम हिन्दी उपन्यास हैं।
अब प्री-ऑडर (अग्रिम) के लिए अमेजन के इस लिंक पर जाएं। https://amzn.in/d/5F3ikU3
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“इस उपन्यास को न केवल पढ़ा जाना चाहिए बल्कि इस पर जगह-जगह चर्चा होनी चाहिए।”
मनीषा कुलश्रेष्ठ
वरिष्ठ साहित्यकार एवं कथाकार
“यह उपन्यास स्थानीय परिवेश, स्थानीय चीजों, हस्तशिल्प, अनाजों, वनस्पतियों के साथ-साथ उस जीवन शैली के विविध रूपों को भी अभिव्यक्त करता है जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं या विस्मृत कर चुके हैं।”
उर्मिला शिरीष
वरिष्ठ साहित्यकार एवं कथाकार
“श्वेता उपाध्याय ने साहित्य और विज्ञान के अद्भुत संगम के माध्यम से एक ऐसी कृति प्रस्तुत की है, जो पर्यावरणीय चेतना को एक नए स्तर पर स्थापित करती है।”
प्रोफेसर डॉ. देवेंद्र मोहन कुमावत
वरिष्ठ शिक्षाविद
“केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि साहित्य के माध्यम से पर्यावरणीय न्याय की सशक्त और ज़रूरी आवाज़ है - और आज के समय में ऐसी आवाज़ की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।"
डॉ. मनोज कुमार मणि चतुर्वेदी
वरिष्ठ पर्यावरणविद्
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